॥ सवैया ॥
राज रहे पहले तहँ जंगल, पूजन संकट स्वप्राण हरामन।
भूपन धौनी राज्य विलोकि, बनाय दिहो सुरम्य यही धामन।।
भक्तन माहिन बीच विराजत, हार रयो भव-बाधन भीड़न।
दिव्य अलौकिक पावन तीरथ, नाश करै सब पीड़न-कीड़न।।
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॥ चौपाई ॥
सुनहि व्यथा फिर मुनिवर बोले।मंदहि मंदहि मुस्के हौले।।
जनक राज सुनहू अब राजा। दूत पठायहू सब साजहिं साजा।।
दूत कहउ सब ही समाचारा। दशरथ बोले बारंबारा।।
कुशल कहहु सब मम सुकुमारा। चंचल लखन राम-दुलारा।।