हुए दूर फिर हम क़रीब आते-आते
बिछड़ने लगे तुम क़रीब आते-आते
बड़ी मुश्किलों से मनाया था तुमको
हुए फिर से बरहम क़रीब आते-आते
सताना मनाना ये अपनी जगह है
यूं रूठो न जानम क़रीब आते-आते
वो दिन थे कि फूलों पे शबनम सजी थी
क्यों बदले हैं मौसम क़रीब आते-आते
चले साथ मंज़िल के जानिब थे दोनों
कहां हम कहां तुम क़रीब आते-आते l
अनमोल