ये गुनाह इस कदर हुआ
मैं खुद से ही निगाह मिला न पा रहा
ये शब मंजर को दर- बदर तस्सवुर कराती
जिस्म से रुह को बेकरार कर जाती,
चश्म थकी सी, मलाल में जल रही
शबाब के आतिश में कर बैठा लग्ज़िश अब,
फकत बदफैल पर सोचने को कह रही
ये मन की उदासी, जिस्म की शहवत सारी
पल भर में ढल जाता,
मगर सीरत पर लगा दाग कालिख बन जाता
चाहत तबाह होकर भी जिंदा रह जाता
मगर वह अनंत स्नेह, तस्सवुर, शब की तड़प
मुआशरा की मलामत इस कदर, सब अश्कों में बह जाता
मत कर ये ख़ता, अनुरागी
हर जख्मों का एहसास , बेवक्त की मार
श्लोक पल पल अश्कों से भर जाता