Gyaani Engineer

शून्य से शून्य तक

मैं शून्य से बना हूँ, शून्य में मिट जाऊँगा,

रेखा सा एक पल का हूँ, फिर शून्य में सिमट जाऊँगा।

 

धूल बन कर उठा था कभी, हवाओं ने घुमाया मुझे,

क्षणभर का था ये सफर, फिर खुद में ही समा जाऊँगा।

 

ना नाम का कोई बोझ होगा, ना यादों का कोई शोर,

एक गहरी सी खामोशी में, चुपचाप उतर जाऊँगा।

 

जिसे रोशनी समझा था सबने, वो महज़ एक सराब था,

अंधेरों की गोद में ही, आखिर को लौट जाऊँगा।

 

ना जीत का उल्लास होगा, ना हार का कोई मलाल,

जो था ही कभी नहीं, वही बन के रह जाऊँगा।

 

मैं शून्य से बना हूँ, शून्य में मिट जाऊँगा,

एक अनंत कहानी का, खामोश सा अंजाम पा जाऊँगा।

 

- Sanoj Das