Gyaani Engineer

मिट्टी का मान

मिट्टी से जन्मा हूँ, मिट्टी की कद्र जानता हूँ,

हवाओं के रुख में छिपा, उसका असर जानता हूँ।

 

कल तक जो धूल थी इन पैरों तले दबी हुई,

आज उन्हीं रास्तों पर, मैं अपना सफर जानता हूँ।

 

गिरा हूँ कई बार, पर संभलना सीख लिया,

धूप में जलकर भी मैंने, पिघलना सीख लिया।

 

हाथ खाली थे मगर, हौसलों की मूरत साथ थी,

काली घनी रातों में भी, जलती एक आस साथ थी।

 

यह जो मुकाम मिला है, यह मेरी पसीने की धार है,

ख्वाबों को हकीकत में बदलने का, हुनर मेरे पास है।

 

ना बुलंदी का गुमां है, ना ज़मीन से कोई गिला है,

मैं जहाँ भी रहूँ, अपनी जड़ों का पता जानता हूँ।

 

वक्त की मार ने सिखाया है, खुद पर यकीन रखना,

तूफानों के सीने में भी, दीया जलाना जानता हूँ।

 

ना थकूंगा मुश्किलों से, ना डरेगा मेरा वजूद कभी,

मैं अपनी पहचान का, मुकम्मल मंज़र जानता हूँ।

 

                                      – Sanoj Das