Waiting for Silence

मुक़द्दर

क्या बात थी की लोग जान दिया लिया करते थे

क्या बात थी की लोग सब कुछ लुटा दिया करते थे

की आज सर-ए-शाम यार लुट रहा तो क्या

कहते हैं यारी भी कभी ईमान हुआ थी

 

वफ़ा- ए- यार पर की हम क़ुर्बान हुए हैं

वो जान-ए-यार महफ़िलों में बेच दिए हैं

की कौड़ियों लुटा दिए लहू- ए-जिगर-ए-यार

के लहू-ए-यार जाम-ए-लब-ए-यार हुए हैं

 

अश्क़-ए-यार पर क़ुर्बान-ए-जान किए हैं

की यार अश्क़-ए-यार को नीलाम किए हैं

किसको कहें  के कौन हमें क़त्ल किए है

के आस्तीनों सांप हमने  पाल रखे हैं

 

की यार, यार के लिए सब कुछ लुटा रहे

 वो यार सारे-ए-आम यार लूट रहे हैं

की आबरू-ए-यार पे क़ुर्बान हुए हैं

की आबरू-ए-यार वो क़ुर्बान किए हैं

-विमल