पलके तुम्हारी क्यों झुकी रहती थीं
क्यों सुर्ख़ तुम्हारे कपोल हुआ करते थे
सिहरन तुम्हारे बदन में क्यों होती थी
लफ़्ज़ क्यों होठों पे रुक जाया करते थे
नज़रों से हमको घायल किया क्यों
मदहोश नशीले नयन से किया क्यों
क्यों तुम ख़यालों में आते रहे हो
हर रात नींदें उड़ाते रहे हो
अब जबकि तुमको है हमने पुकारा
तो क्यों नहीं सुनते हमारी सदाएँ
गुनाह यदि है तो बस ये तुम्हारा
बस एक बार बता दो—क्या हमारा क़सूर है
— विमल