मेरी क़लम चला दो
तुम क्या जानो क्या हो मेरी,
कैसे समझाऊँ तुझको मैं।
कुछ बाक़ी है तो कर डालो,
ये पीड़ा कुछ तो समझो तुम।
क्या करूँ सजन, नहीं सूझता कुछ
मेरी बोली में समा जाओ।
मैं कविता लिखने बैठा हूँ,
मेरी क़लम चला दो तुम!
कई दिन से कोई दर्द नहीं,
शक है कि शायद ज़िंदा हैं।
कुछ तो बोलो मेरी देवी,
ये दर्द ही मेरी प्रेरणा है।
कुछ आदत ऐसी हो गई है
कि दर्द बिना नहीं चैन मुझे।
वो ज़ख़्म हमारा सूख रहा,
मुझको नया घाव लगा दो तुम।
कैसे दिन थे वो सजनी,
रोए थे रक्त के आँसू हम।
कैसे दिन थे जब अपनी साँसें
तुमको दे डाले थे हम।
मेरी ख़ुशियाँ जिनमें बसतीं,
मेरा वो दर्द लौटा दो तुम।
मेरे आँसू हैं सूख चले,
फिर से रोना सिखला दो तुम।
मैं कविता लिखने बैठा हूँ,
मेरी क़लम चला दो तुम!
— विमल