Waiting for Silence

ज़िद्दी

ज़िद्दी

मुझको कितनी ठोकर मारी हर बारसंभल ही जाता हूँ

मुझको कितना तोड़ा अबतक फिर भी मैं जुड़ता जाता हूँ

वो कौन ख़ता है हे  ईश्वर इक बार मुझे बतलाओ ना

अबके मुझको ऐसा तोड़ो टूटूँ तो फिर जुड़ पाऊँ ना

 

पत्थर तुम हो पत्थर हम हैं इतना मैं और समझता हूँ

तुम आसमान के तारे हो मैं राह मैं ठोकर खाता हूँ

चूर हुआ थक कर मालिक कहीं ख़ुद ही मैं गिर जाऊँ ना

अबके ऐसे ठोकर मारो गिर जाऊँ तो उठ पाऊँ ना

 

कितनी बार जला, मुझको तू जला मुझे मैं सहता हूँ

नही भरते मेरे घाव प्रभुअनजला राख का कोयला हूँ

मन घायल है तन पागल है थोड़ा और जलाओ ना

अबके ऐसे मुझे आग लगा राख भी मैं बन पाऊँ ना

 

पत्थर दिल हूँ मैं मालिक फिर दर्द ये कैसा उठता है?

आंसू तो सारे सूख गए आँखें क्यूँ नम हो आयी हैं?

इस बार हमारी बात रखो विश्वास कहीं टूट जाए ना

इस बार रुलाना ऐसा की अगली बार रो पाऊँ ना

 

क्या हक़ है राह के पत्थर को कोई भी चाह बढ़ाने का?

क्या हक़ है सूनी आँखों को दो सपनों में खो जाने का?

क्या हक़ है मुझको हे ईश्वर एक बार मुझे समझाओ ना

अबके ऐसे मुझे पास बुला आजाऊँ तो फिर जाऊँ ना

-विमल