Waiting for Silence

सच्चा मन का, बदक़िस्मत है

सच्चा मन का, बदक़िस्मत है

 

क्या बतलाऊँ कि ग़म क्या है?
कैसे बतलाऊँ सच क्या है?
सपना मेरा टूक‑टूक बिखरे,
शायद मैं टूट रहा हूँ अब।

 

सबके ग़म लेना चाहता हूँ,
सबको सुख देना चाहता हूँ,
पर कुछ बातों पर ज़ोर नहीं,
क़िस्मत से हार रहा फिर से।

 

खोने का दुःख मैं जानता हूँ,
पालूँ कुछ ऐसी इच्छा है,
कैसे मैं देखूँ टूट रहे
सपने जो मैंने देखे हैं।

 

शायद कुछ ऐसा मुझमें हो,
नहीं देख सके तू, अंतर में,
फिर भी दुःख का एहसास करो,
तू मेरी अपनी सजनी है।

 

संगी तू भोली‑भाली है,
मत देख जो तुझको दिखता है,
साथी से कोई भेद न कर,
सच्चा मन का, बदक़िस्मत है।

— विमल