Waiting for Silence

नेताओं से

नेताओं से

(अक्टूबर १९८४ - दिसम्बर १९८९ )

 

इन्होंने भारत देखा,
पूरे पाँच साल देखते रहे,
पूरा नहीं देख पाए।

इन्होंने देखा कैसे
तड़प रहे हैं,
मर रहे हैं,
टूट रहे हैं,
जूझ रहे हैं लोग—
इन्हें दया नहीं आई।

अब फिर से देखने के लिए
देख रहे हैं
हमारी ओर,
शायद अबकी देख पाएँ—
इनको वोट दीजिए।

 

(दिसम्बर १९८९-नवम्बर १९९० )

 

 

फिर ये आए
चार आँखों के साथ,
कान टोपी में छिपा कर,
क्योंकि सुनी नहीं जाती
चीख गरीब की।

दिल से राज किया
जो सिर्फ इन्हीं के पास था,
हमने अपने उत्थान के लिए
इन्हें उठाया,
और इन्होंने भी उठाया
मगर कुछ को
दिल से उठाया
वो फिर गिर गए।

काश दिमाग से उठाते

 

(नवम्बर १९९० -मार्च १९९१ )

 

 

और फिर ये आए
नाम रोशन करने वंश का,
इनसे क्या आशा करें
ये तो स्वयं निर्भर थे किसी पर।

 

सुना था अतीत लौटता है,
इतिहास वर्तमान होता है,
लेकिन क्या सिर्फ दस वर्षों में?

( मार्च १९९१ )

 

अरे नेताओं, कब तक?
आखिर कब तक?
खेलते रहोगे भावनाओं से,
तोड़ते रहोगे दिलों को,
विश्वास को
कब तक, कब तक?

 

तुम विशिष्ट हो,
महान हो,
भर लेते हो पेट
कूटनीति से,
सिद्धांतों की राजनीति से।

किंतु हम इंसान हैं

हमारे पेट खाली हैं,
हमको रोटी दो।


वादों से दिल भरता है,
मगर अब दिल मर चुके हैं
सुन-सुनकर झूठी तसल्ली को।

 

हमको रोटी दो
हम भूखे हैं।

और हो सके तो मत खेलो
हमारी भावनाओं से,
आशाओं से,
विश्वास से।

हम भूखे हैं

रोटी दो।

नारा दिया - गरीबी हटाओ!
गरीबी हटी! सच में!!
फर्क सिर्फ व्यक्ति और जगह का है!!

गरीबी हमने हटाई!!!
गरीबी तुम्हारी हटी!!!!!

सांप्रदायिक हम नहीं—तुम हो,
तुम्हारी अपनी एक जाति है,
सिर्फ उसी का उत्थान करते हो।

तुम्हारी एकता महान है,
तुम्हारी अखंडता महान है
तुम महान हो।

 

— विमल