रौशनी की ओर
देखता था मैं सपने सदा उस जहाँ के
गगन‑चुंबी था उल्लसित मन ये मेरा
मैं तूफ़ान की ज़िद तोड़ना चाहता था
बहती नदिया को मैं मोड़ना चाहता था
चूम लेता हिमालय की ऊँचाइयों को
नाप लेता मैं सागर की गहराइयों को
मेरा साहस था, मैं ज़हर को चखूँगा
मेरी हिम्मत थी, आग से खेल लूँगा
तोड़ डाला मुझे मेरे ही अपनों ने
दफ़न कर दिया ज़िंदा मुझे बेरहमों ने
बनाते हैं जाम मेरे अश्क‑ओ‑लहू से
मनाते हैं जश्न ये सब ज़ालिमों से
मैं खुश हूँ मगर, ईश्वर तू सुन ले
बढ़ा ले दुखों को, पर मेरी भी सुन ले
रुकूँगा नहीं मैं, झुकूँगा नहीं
सामने मुझको अब रौशनी दिख रही है
हूँ अकेला तो क्या, मैं अकेला नही
मेरे सपने ही मेरे हमसफ़र बने हैं
— विमल