फ़ना
शहर वालों, क्या तुम कर रहे हो बंद कमरों में
कि आ जाओ, और बोली बोल दो, मेरा तमाशा है।
नहीं देखी कभी होगी, कि मौका आज अच्छा है,
कि चौराहे पे बिकती आज ये मेरी मोहब्बत है।
क़सम तुझको ख़ुदा की, आज मेरी जान आएगी,
नहीं देगा मुझे मेरी मोहब्बत जान जाएगी।
मैं पढ़ता फ़ातिहा, अपनी मोहब्बत का ये सेहरा है,
कि चौराहे पे लुटती आज ये मेरी मोहब्बत है।
अरे कोई आज तो कह दो कि क्या है रंज़ सजनी को,
परेशान देखते, बेबस से, हम अपनी मोहब्बत को।
सजन, तुम भी चलो और देख लो मेरा जनाज़ा है,
कि चौराहे पे सजती आज ये मेरी मोहब्बत है।
तुम्हें कुछ शेर कहता हूँ कि थोड़ा जश्न हो जाए,
कि साक़ी बन तुझे मैं अश्क अपने पेश करता हूँ।
मुबारक ईद तुझको, आज तो मेरा मुहर्रम है,
कि चौराहे पे कटती आज ये मेरी मोहब्बत है।
- विमल