मैं लिपटता हूं तेरे ग़म से तो जी लेता हूं
शाम होते ही तेरी याद में पी लेता हूं
अपने रस्ते के सारे कांटे मैं खुद चुनकर
अपने दिल के ज़ख्मों को भी यहां सी लेता हूं
इससे ज़्यादा भी तेरी आरज़ू करूं कैसे
बंदगी में अब तेरे नाम को भी लेता हूं
चाहे हो खुशी या हों ग़म की वो यहाँ बातें
मुस्कुराके अब हर एक दौर को जी लेता हूं
शाम होते ही तेरी यादों में खो जाता हूं
जाम हाथ में हो या ज़हर हो पी लेता हूं।
अनमोल