नज़्म
कल यूं बैठकर कि मैं ये सोचने लगा
आखिर मुझको ऐसी ज़िंदगी से क्या मिला
न घर मिला, न प्यार, न राहत, न माल-ओ-दर
क्यों उम्र भर पीता रहा भर-भर के मैं ज़हर
एक पल के भी सुकून को तरसता रहा यहां
क्यों ज़िंदगी की चाह में मरता रहा यहां
हर एक नफ़स जैसे ज़हर घोलती रही
मेरी अना मुझसे यही बोलती रही
कि कुछ नहीं रखा है मोहब्बत में, प्यार में
फँसा रहा है दिल को तू यहां बेकार में
जिस-जिससे लगेगा ये दिल वो तोड़ेगा इसे
आखिर में वो कहीं का नहीं छोड़ेगा इसे
बेहतर है कि इस दिल को लगाना नहीं कहीं
सपने भी बहुत आंखों में बसाना नहीं कहीं
बस दूर से देखो ये तमाशे, ये नज़ारे
पर याद रखो ये कभी न होंगे तुम्हारे।
अनमोल