काश… ये हो जाता,
काश… वो हो जाता,
काश… मैं यह कर पाता,
काश… मैं वो बन पाता।
काश, बस एक शब्द नहीं,
एक अरमान है।
किसी को घर बसाना है,
किसी को पाना सम्मान है|
किसी को नौकरी पानी है
कोई बैठा कर्मचारी की तलाश में,
बहुत कुछ कर देने-सकने की ताकत और क्षमता है
इस एक शब्द “काश” में।
शब्द नहीं, सपनों का गुलदस्ता है
जो महँगा नहीं, जिसे पाना सस्ता है,
जो हर कोई प्रयोग करता है
चाहे वो हो सफल, या वो जिसका हाल खस्ता है।
सही-गलत से परे है ये शब्द
धर्म-अधर्म से भी परे है,
इसका प्रयोग कुछ पाने खातिर हत्यारे भी करते हैं
और वह भी करते , जो देश के खातिर सरहद पे मरे हैं।
प्रयोग तो इसका हर कोई करता
पर क्या हर कोई सही मायनों में प्रयोग करता है?
और अक्सर गलत अर्थ के साथ प्रयोग के कारण
कईयों का ख़्वाब अंत होकर , आखिर इस शब्द में ही ढलता है।
इस शब्द के प्रयोग के साथ
हर सफल आदमी परिश्रम करता है,
और ऐसे ही , “काश” का सही उपयोग कर
वह आदमी ,नई पहचान लेकर उभरता है।
— दिव्य डनसेना
एक युवा लेखक