किसी ने देखा तो नहीं तुझको यहाँ आते हुए
तुम्हें इन फूलों को यहां मेरे लिए लाते हुए
तुम्हें अब कैसे मैं मोहब्बत का कोई खत ही लिखूं
हैं ये बातें राज़ की, डर लगता है बताते हुए
कि यहां दी छोड़ ये दुनिया सिर्फ तुम्हारे लिए
न तरस आया तुझे अब हमको यूं सताते हुए
कभी तुम्हारा भी इरादा वापसी का नहीं था
हुई है मुद्दत मुझे फिर तुझको भी बुलाते हुए
कभी हमने भी जो बसाया वो जहां साथ यहां
उसे हम कैसे चले जाते यूं ही जलाते हुए
ये नहीं है बात कि दिल को अब वफ़ा रास नहीं
हुई मुद्दत अब हमें तुझसे दिल को लगाते हुए।
अनमोल