Anmol Sinha

आईना (नज़्म)

आईना (नज़्म)

 

मेरे चेहरे के हर एक राज़ को ये जानता है

ये आईना मुझसे बेहतर मुझे पहचानता है

 

मेरी मुस्कान, मेरे अश्क़, मेरी ख़ामोशी 

मेरे जज़्बात, मेरी ख़िरद, मेरी मदहोशी

टालता कुछ नहीं, हर बात मेरी मानता है

ये आईना मुझसे बेहतर मुझे पहचानता है

(ख़िरद: बुद्धि/विवेक)

 

अँधेरा करते ही ये आँखें मूंद लेता है

शायद ये मेरे अकेलेपन को समझता है

जब मैं जाऊं इसके सामने तभी ये मिलता है

यूं बेवजह ये मुझसे नहीं उलझता है

 

मैं जैसा चाहूं इसमें ख़ुद को देख सकता हूं

जब भी चाहूं मैं इसके सामने आ सकता हूं

यूं मेरे बार-बार इसके सामने आ जाने से

ये चिढ़ता नहीं है कभी मेरे यूं चिढ़ाने से

 

हर बार मेरी तस्वीर ये दिखाता है

मैं क्या हूं ये चुपके से बताता है

भले सता लूं जितना भी मैं इसको

पर ये है कि मुझको नहीं सताता है

 

मैं इसके सामने न जाने क्या-क्या बोलता हूं

इसके सामने हर राज़ दिल के खोलता हूं 

बड़ी ख़ामोशी से ये सुनता है मेरी बातों को

कभी दोहराता नहीं है ये मेरी बातों को

 

ये आईना मुझे आईना दिखाता है

मैं क्या हूं ये चुपके से बताता है।

 

अनमोल