फ़ासले (नज़्म)
साथ-साथ चलते हुए
गिरते-संभलते हुए
हम इतने क़रीब आ गए
कि फ़ासले होने लगे
कभी रात-दिन का साथ था
हाथों में तेरा हाथ था
होती थी तुझसे गुफ्तगू
तेरी महक थी चारसू
अब भी वही दिन-रात हैं
कहने को अब भी साथ हैं
रहते तो हैं एक घर में हम
हैं एक ही सफ़र में हम
पर बोलते अब कुछ नहीं
शायद ज़रूरत ही नहीं
क्यों इतने क़रीब आ गए
कि फ़ासले होने लगे
मुद्दत हुई है बैठकर
आंखों में आँखें डालकर
कुछ बिन कहे, कुछ बोलकर
फिर अपने दिल को खोलकर
कुछ गुफ्तगू अपनी हुई
कुछ याद अब आता नहीं
कि ऐसा पहले कब हुआ
हुआ भी है या नहीं
क्या इसको क़ुर्बत कहते हैं?
इसको मोहब्बत कहते हैं?
क्या दिन अजीब आ गए
क्यों इतने क़रीब आ गए
कि फ़ासले होने लगे
तुम अब भी मेरे साथ हो
पर साथ क्यों नहीं है हम
कहने को हम आबाद हैं
पर आबाद क्यों नहीं है हम
क्यों हैं अलग-अलग से हम
क्यों हैं घुटे-घुटे से हम
किस चीज़ की कमी सी है
आंखों में क्यों नमी सी है
वो क्या था जिसको खो दिया
वो क्या है जिसे पाना है अब
इस दौड़ में सब छिन गया
हमने यही जाना है अब
कब ज़िंदगी की धूप में
बादल घनेरे छा गए
क्यों इतने क़रीब आ गए
कि फ़ासले होने लगे
अब वो ज़माने खो गए
दिल के ख़ज़ाने खो गए
अब सिर्फ़ एक रब्त है
अपने याराने खो गए
कैसी अजीब बात है
तन्हाईयों का साथ है
न वो अपने दिन रहे
न अब वो अपनी रात है
इस ज़िंदगी की राह में
न जाने किसकी चाह में
हम यहां तक आ गए
क्यों इतने क़रीब आ गए
कि फ़ासले होने लगे।
अनमोल