uglykavi

सपने अपने अपने

कुछ खुद को
शेर समझते हैं
तो कुछ गया गुजरा।
कुछ अभागे खुद को
अभिजीत दीपके
समझते हैं।
चंद दिनों में
सबीर भाटिया
से भी बड़ा
करना चाहते हैं।
सपने सबके होते हैं -
सिर्फ मुर्दों के नहीं।
नाचते गाते
झूमते रीझते
कहते फिरते
अंतर्यामी आचार्य
श्री श्री महागुरु घंटाल -
करा लो जाँच पड़ताल।
रहेगा तू वही रे -
महामूर्ख नादान अनजान।


- कवि लटपट गोरखी