Tanishk S Rathore

झूठ

ना उसकी याद रही,

ना उसका ज़िक्र अब ज़ुबान पर आता है।

 

अब नसीम-ए-सबा में, आती कोई मेहक नहीं,

अब इन मुर्दा नज़रों में, बची कोई तस्वीर नहीं।

 

अब तो इस खाली दिमाग़ में,

बची है तो कोई याद नहीं।

 

वाह! क्या खूब झूठ लिखा है,

अरे इतना सोचा उसके बारे में कि लिखना पड़ा,

पर बात दिलासा की थी, 

बस इसलिए उसे भूली किताब लिखना पड़ा।