माँ तुम कितनी अच्छी हो
जब भी उदास मैं होता हूँ,
हर ओर अँधेरा दीखता है
माँ तेरी बस एक छवि
सारा संताप मिटाती है
हर पल अंखियों में बसती हो
माँ तुम कितनी अच्छी हो
पता नहीं कैसे इतना
मेहनत करती जाती हो
मस्तक पर कोई शिकन नहीं
हर काम स्वयं कर लेती हो
कैसे तुम इतना करती हो
माँ तुम कितनी अच्छी हो
कितनी दूर चला आया
कितनी राहें होता आया
तेरा ही प्रकाश है मां
जिसमें मैं बढ़ता रहता हूँ
देवी जैसी लगती हो
माँ तुम कितनी अच्छी हो
भोली भाली बातों में
रोटी जब मुझे खिलाती हो
सच कहता हूँ माँ दुनिया की
हर चीज तुच्छ सी लगती है
मेरी हर बातें सुनती हो
माँ तुम कितनी अच्छी हो
अगर भाग्य सचमुच है
मेरा ही सर्वोत्तम है
माँ तू मुझको ही जो मिली
सफल हुआ ये जीवन है
कितनी प्यारी लगती हो
माँ तुम कितनी अच्छी हो
भगवान अगर तुम सचमुच हो
मेरी इक विनती सुन लेना
हर बार मुझे इस धरती पर
मेरी माँ ही मुझको देना
कितनी सुन्दर लगती हो
माँ तुम कितनी अच्छी हो
-विमल
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Author:
विमल (Pseudonym) (
Offline) - Published: April 14th, 2026 01:05
- Category: Unclassified
- Views: 4
- Users favorite of this poem: Priya Tomar
- In collections: General.

Offline)
Comments1
An offering to mother .
Nicely done .
Thank you. She passed away during Covid.
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