किसान
जेठ की दुपहरी जूझता है,
जाड़े की रात ठिठुरता है।
करता है खून‑पसीना एक,
दिन‑रात वह मेहनत करता है॥
चोटी से गाढ़ा पसीना जब
एड़ी तक जाकर बहता है,
तब यह धीरज का पुतला
दोवक़्त का भोजन करता है॥
इस जून चबैना हो जाए,
उस जून की रोटी मिल जाए,
पर सारे भारत में कोई
खाली पेट न सो जाए॥
खेत उसी का मंदिर है,
खेती ही उसकी पूजा है।
सच्चा वही पुजारी है,
सच्चा धर्म उसी का है॥
क्या सोचा उसने जीवन में,
किस धर्म की खेती करता है?
क्या मतलब हिन्दू‑मुस्लिम से,
वह तो बस मेहनत करता है॥
कैसा ये अन्याय यहाँ,
क्या कभी किसी ने देखा है?
हमको रोटी देने वाला
स्वयं सो रहा भूखा है॥
ओ होश करो तुम नेताओं,
धन के लोभी ओ लालाओं!
नहीं पेट भरेगा वोटों से,
नहीं भूख मिटेगी नोटों से॥
कहीं ऐसा वक्त न आ जाए,
मन इसका ही यदि मर जाए,
इक बात ध्यान कर लो तुम सब,
वह देश का मृत्यु‑दिवस होगा॥
क्या सोचा तुमने एक बार,
क्या करते हो तुम जीवन में?
लेकिन हर एक किसान यहाँ
लाखों को जीवन देता है॥
हम कायर, तुम ही वीर पुरुष,
हम लोभी, तुम संतोषी हो।
हम पाखंडी, तुम सत्यधर्म
हम भक्षक हैं, तुम पालक हो॥
हे वीर पुरुष, हे धीर पुरुष,
मानव तुम सच्चे अर्थों में।
हे वीर लाल धरती के तुम,
मेरा स्वीकार नमन कर लो॥
— विमल
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Author:
विमल (Pseudonym) (
Offline) - Published: April 22nd, 2026 00:00
- Comment from author about the poem: Farmer suicides
- Category: Reflection
- Views: 7
- Users favorite of this poem: sorenbarrett, Tristan Robert Lange
- In collections: Pain.

Offline)
Comments2
What a beautiful poem of tribute to the common man the farmer provider of food for a nation. Well written and a fave
Thank You so much.
In India Farmers commit suicide due to poverty and if cultivation is destroyed due to untimely rain or no rain.
You are most welcome and that is a sad situation where the food provider can not afford food themself.
विमल, आशा है आपको बुरा नहीं लगेगा कि मैं इस तरह जुड़ रहा हूँ…मुझे भारत से गहरा प्रेम है। कुछ समय पहले मुझे तीन हफ्तों के एक क्रॉस-कल्चरल ट्रिप पर आने का अवसर मिला था—केरल, मैसूर, दक्षिण-मध्य भारत, फिर चेन्नई, और अंत में दिल्ली-आगरा तक…जहाँ हमने ताजमहल भी देखा। उस यात्रा ने बहुत कुछ भीतर बदल दिया। केरल की हरियाली, मसालों के बागान, चाय के बागान…सब कुछ आज भी याद है। सच कहूँ तो जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ की भौगोलिक अनुभूति कुछ हद तक केरल से मिलती है। यहाँ भी बहुत किसान हैं…और वे भी संघर्ष करते हैं। इसीलिए आपकी कविता ने मुझे गहराई से छुआ। यह सिर्फ एक देश की बात नहीं लगती…यह हर उस इंसान की आवाज़ है जो धरती से जुड़ा है और दूसरों के लिए जीता है। आपकी भाषा बहुत सुंदर है…सीधी, सच्ची और दिल तक पहुँचने वाली। आशा है आप बुरा नहीं मानेंगे कि मैं इस तरह अपनी भावना साझा कर रहा हूँ। सच में…तकनीक के लिए ईश्वर का धन्यवाद, जो हमें इस तरह जोड़ देती है। 🙏🌾🌹🖤🙏🕯️🐦⬛
Thank you. People are fighting for ego because they get belly full food 3 times.
Egos do so much damage, don't they? You are most welcome, my friend. Keeping that whole situation in my prayers.
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