मेरी वफ़ा की देवी क्यूँ चुप चाप खड़ी है ?
पल पल ही टूटता हूँ ना मुझको यार तोड़
तू संगी है मेरा यूँ ही साथ ना अब छोड़
कोई तो कभी मिलेगा मेरे घाव देखेगा
रख देगा मरहम प्रेम का की आस यही है
ज़िंदगी की राह में दीवार खड़ी है
एक फूल है और काँटो की सेज बनी है
तू फूल बन और इस जिगर को कुछ सुंकूं तो दे
मत रूठ मेरे यार मेरी जान चली है
आंसू नही दिखे तो क्या रो नही रहा?
सारे सूख गए हैं ऐसी आग लगी है
हम मुस्कुरा देते तो क्या कोई दर्द नही है?
कर प्यार की दो बात मेरी चाह यही है
विश्वास कर मुझपर की मेरी जान तू ही है
इक बार आज बोल मेरी यार तू ही है
ये खून आज बहेगा तेरी सजा यही है
मेरी वफ़ा की देवी क्यूँ चुप चाप खड़ी है ?
-विमल
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Author:
विमल (Pseudonym) (
Offline) - Published: May 4th, 2026 00:36
- Category: Unclassified
- Views: 3
- In collections: StillLovingYou.

Offline)
Comments2
a nice monologue emerged as the reaction against silent treatment .
well done .
This poem speaks in questions unanswered that torment the narrator. Questions of lack of attention in the face of love. Well done
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