अपनी पीड़ा समझा दो तुम
माना तुझमें वो ताक़त है
पी लोगी अपने आँसू को
पर संगी हूँ मैं तेरा
मेरा हक़ मुझको दे दो तुम
अपने आँसू मुझको दे दो
अपनी पीड़ा समझा दो तुम
तेरी हँसियों में देख रहे
उन आँसुओं को जो सूख गए
आज सखा इस संगी को
अपने वो राज़ बता दो तुम
अपने आँसू मुझको दे दो
अपनी पीड़ा समझा दो तुम
तेरे आँसू क्या तेरे हैं?
तुमको ही सहना आता है?
हमने भी बहुत बहाए हैं
जो शेष बचे वो दे दो तुम
अपने आँसू मुझको दे दो
अपनी पीड़ा समझा दो तुम
मैंने भी सब कुछ खोया है
मैं खून के आँसू रोया हूँ
मेरा भी दर्द से नाता है
विश्वास मेरा अब कर लो तुम
अपने आँसू मुझको दे दो
अपनी पीड़ा समझा दो तुम
— विमल
-
Author:
विमल (Pseudonym) (
Offline) - Published: May 18th, 2026 00:34
- Category: Unclassified
- Views: 2
- In collections: StillLovingYou.

Offline)
Comments1
A poetic plea for confidence that asks another to share their pain. Well penned
To be able to comment and rate this poem, you must be registered. Register here or if you are already registered, login here.