बस यूँ ही
पीने का मज़ा क्या, जो साक़ी ही नहीं
प्याले की अहमियत क्या, शराब के बिना
नैया का भाग्य क्या, जो माँझी नहीं रहा
मंज़िल की अहमियत क्या, इंतज़ार के बिना
जीवन ही क्या जिया, जो कष्ट न मिला
सुख का भी मतलब क्या है, संताप के बिना
ठोकर ही क्या लगी, जो दर्द न हुआ
वो चोट भी क्या है, जिसको भुला दिया
गर कीचड़ ही न हो; क्या कमल, कमल हुआ?
सरताज गुलाब है नहीं, बिन काँटों यदि खिला
आँखों सहित वो अंधा, जिसमें हया नहीं
दिल ही नहीं है वो, जिसमें दर्द नहीं
वादा भी क्या किया, जो निभा ही न सका
वो दोस्त भी क्या है, जिसने भुला दिया
कुछ भी नहीं किया, जो प्यार न किया
शायर बना कौन, टूटे जिगर बिना
— विमल
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Author:
विमल (Pseudonym) (
Offline) - Published: May 12th, 2026 03:07
- Category: Unclassified
- Views: 5
- Users favorite of this poem: Priya Tomar, sorenbarrett, rakhi semwal

Offline)
Comments2
Waah !
Jabab nhi ....
Shukriya
The necessities of opposites for the existence of either. Well written and a fave
Thank you so much
You are most welcome
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