वर्षा ऋतु

Waiting for Silence

वर्षा ऋतु

मस्त हवा स्वच्छंद चली
हलकी‑हलकी धूप खिली
वर्षा ऋतु के यौवन में
कली‑कली है खिली हुई

 

पूर्व दिशा में ऊपर कुछ
सूरज है शरमाया‑सा
छिपा ओट बदली के आँचल
हल्का‑सा मुस्काया‑सा

 

हरित वसन में धरती देखो
लाज‑सी सिमटी जाती है
पावस ऋतु के पावन जल से
अपनी प्यास बुझाती है

 

टर्राते मेंढक को देखो
तान छेड़ते स्वागत में
पिहु‑पिहु कर मोर नाचता
पंख उठाए जंगल में

 

प्यासा वह चातक अब जाकर
सुख की साँसें लेता है
नक्षत्र स्वाति के बूँद से अपने
कंठ को गीला करता है

 

मैं भी कुछ अलसाया‑सा
सपनों में कुछ खोया‑सा
ऋतुओं की इस रानी का
हर्षित मन स्वागत करता हूँ

 

- विमल

  • Author: विमल (Pseudonym) (Offline Offline)
  • Published: May 22nd, 2026 00:05
  • Category: Unclassified
  • Views: 1
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