राष्ट्रमंदिर
ये चहुँ ओर फैली बहारें हैं अपनी,
नई‑नई कलियों की ये कतारें हैं अपनी।
है धरती ये अपनी, ये अम्बर है अपना,
ये चंदा, सूरज, सितारे हैं अपने।
वतन जब है अपना, लड़ना है कैसा?
ईश्वर है एक, ख़ुदा भी वही,
जीवनदाता वही, पालन करता वही।
फिर ये अपना‑पराया है कैसा और क्योंकर?
नहीं कोई अंतर किसी के लहू में,
हैं ऊँच‑नीच कैसी, भेदभाव कैसा?
न हिंदू है कोई, न मुस्लिम है कोई,
नहीं सिख है, ईसाई है नहीं कोई।
मानव हैं हम, धर्म मानवता अपना,
फिर धर्म‑जाति पर लड़ना ये कैसा?
क्या फूलों को तुमने लड़ते हुए देखा?
कमल को गुलाब से झगड़ते हुए देखा?
खुश है गुलाब काँटों में खिलकर,
सुख मिल रहा कमल को कीचड़ में पलकर।
नहीं रह सकते मगर हम क्यों मिलकर?
जो टूटा था मंदिर फिर से बनेगा,
मस्जिद जो टूटी है, वो भी जुड़ेगी।
मगर दिल जो टूटे हैं, क्या फिर जुड़ेंगे?
जुड़ेंगे तो क्या जोड़ दिखाई न देंगे?
रहने वाला है एक, झगड़ना है कैसा?
बड़ा है वतन, बड़ी हमारी है जननी,
उसी की सभी को पूजा है करनी।
बनाओ उसी को अपने दिलों में,
करुणा, दया, प्रेम का राष्ट्रमंदिर।
हम फूल हैं तरह‑तरह के खिले एक चमन में,
सुवासित करें इस भूमि को जतन से।
जगत में करें नाम अपने वतन का
आशा यही, राष्ट्र सबसे है रखता।
— विमल
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Author:
विमल (Pseudonym) (
Offline) - Published: May 19th, 2026 02:02
- Category: Unclassified
- Views: 5
- Users favorite of this poem: rakhi semwal, sorenbarrett, Tristan Robert Lange

Offline)
Comments2
A lovely message in poetic form well said. We are all the same and all one yet over greed and prejudice we fight. A fave
Thank you
Vimal, I appreciated how this approaches faith, identity, and nationhood through shared humanity rather than separation. The poem keeps returning to compassion, coexistence, and mutual care instead of rivalry, and that gives it a real warmth throughout. Powerful piece, my friend. 🌹🖤🙏🕯️🐦⬛
Thank you so much. Much appreciated.
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