जिसका सजदा किया वो ख़ुदा ही न था
ज़िंदगी तुम कहाँ ले चली हो मुझे
इतना भी समझ हमको आया न था
एक तारा फ़लक से गिरा क्या हुआ
आसमान भी तो इतना बेचारा न था
डुबाते रहे रात भर जाम में
मैक़शों में नशा हमको आया न था
हम मशगूल किस क़दर थे दोस्तों
वो डस गए हमको इशारा न था
ज़माने को हमने कहा होश कर
और ज़माना ही हमको जगा रहा था
वक़्त की इंतज़ारी हम करते रहे
वक़्त गुज़र भी गया और पता भी न था
गुरूर करते रहे दूरअंदेशी हैं
वो आया, दिया ज़ख़्म पता भी न था
मंज़िलों को तलाशते रहे सरज़मीन
सामने मंज़िल थी और नज़ारा न था
पी गए हम भुलाने ग़मे‑ज़िंदगी
जो पीते थे वो पैमाना न था
रौशनी आफ़ताब को दिखाते रहे
जो रात आई, लौ देने वाला न था
यों तो हमको मयस्सर नहीं थी हँसी
एक ख़ुशी भी मिली, वो गवारा न था
ले लिख ले नसीब जो ख़ुदा ने कहा
हम लिख न सके, हमको आया न था
यों तो अक्सर ख़यालों में रो दिए हैं
आज ग़म है, नज़र को गवारा न था
रात थी, हम आँखें किए बंद थे
सहर में भी रौशनी का नज़ारा न था
राह में हमको जो हाथ देता भी था
हाथ पकड़ा, वो मेरा सहारा न था
हर क़दम पर निभाएँगे वादा किया
दो क़दम ही चले, साथ वाला न था
जिस तारे के खातिर हम अब तक जिए
जो मिला भी तो मेरा सितारा न था
इस क़दर मार कर वो हमको गए
हम मर भी गए फिर भी मारा न था
ज़ख़्म देकर वो हमको हँसाते रहे
जो हँस भी दिए तो गवारा न था
यों तो अपना लहू भी बहुत गर्म है
क्या कहें, उबाल उसमें आया न था
साथ हरदम चला था मेरी राह में
जो दिखता था मेरा वो साया न था
क्या बताएँ मुक़द्दर भी क्या चीज़ है
हमसफ़र जो हुआ वो हमारा न था
झूठ के साए में हम अब तक जिए
सच बोला तो सुनना गवारा न था
पिला दे कि ख़ुद को भूल जाऊँ मैं
जहाँ में ऐसा कोई मैख़ाना न था
भँवर में चलाते रहे हाथ‑पैर
उस नदी का कोई किनारा न था
ले गए हम सफ़ीना को मंझधार में
नाख़ुदा से कोई याराना न था
इबादत किए भी तो क्या नसीब है
जिसका सजदा किया वो ख़ुदा ही न था
ऐ ख़ुदा तू ज़मीन से उठा ले मुझे
ज़िंदा रहना तो इतना प्यारा न था
-विमल
-
Author:
विमल (Pseudonym) (
Offline) - Published: June 2nd, 2026 03:27
- Category: Love
- Views: 3
- Users favorite of this poem: Tristan Robert Lange
- In collections: StillLovingYou.

Offline)
Comments3
Couplets of duality where there appears conflict sometimes finding resolution and often not. Well done Vimal
Thank You so much.
You are most welcome
Vimal, I've known seasons where certainty slipped through my fingers and things I trusted turned out to be far less solid than I believed. This speaks to that experience with remarkable honesty. Beneath the sorrow, I also hear someone wrestling fiercely with truth, and that gave the poem real weight for me. Wonderful write, my friend. 🌹🖤🙏🕯️🐦⬛
Thank You so much
Vimal, I've known seasons where certainty slipped through my fingers and things I trusted turned out to be far less solid than I believed. This speaks to that experience with remarkable honesty. Beneath the sorrow, I also hear someone wrestling fiercely with truth, and that gave the poem real weight for me. Wonderful write, my friend. 🌹🖤🙏🕯️🐦⬛
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