हां कब से मैं किसी तो खाना-ए-ख़राब में हूं
हुआ हूं जब से मैं पैदा किसी अज़ाब में हूं
(अज़ाब: सज़ा/यातना)
क़रीब होके भी मुझको वो देख पाता नहीं
मैं लगता है कि किसी दूर के सराब में हूँ
इसी भरम में कि मिलने तू मुझसे आने को है
अभी तलक मैं यहां हालत-ए-ख़राब में हूं
कभी अकेले में करना तु याद फिर से मुझे
तेरे सवाल में हूं और कभी जवाब में हूं
कहीं नज़र में न आ जाऊं कातिलों के कभी
तो इसलिए मैं अभी इस तरह नक़ाब में हूं।
अनमोल
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Author:
Anmol (Pseudonym) (
Online) - Published: June 4th, 2026 12:17
- Category: Unclassified
- Views: 1

Online)
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