जो कला को पहचान ले ।।

Divya Dansena

कम मिले पर मिले ज़रूर
ऐसे लोग जो कला को पहचान लें,
बहुत कम ही मिले वह लोग
जो कला को पहचान दें।

जाने कैसे कोई एक चित्र को घंटों निहार सकता है?
ऐसा मैं सोचा करता था,
बहुत देर बाद समझ आया कि उस चित्र में कोई जीवित था
एक राजा, अपनी रानी और प्रजा के लिए उसमें मरता था।

कला! जो राजाओं को सराहनीय लगता था।
कला! जो प्रजा को आदरणीय लगता था।
आज वही 
सड़कों पे बिकता है,
या सीमित रह जाता उन पन्नों पर
जहाँ पर वो कवि लिखता है।

कला से न कुछ ऊँचा हुआ
कला से न कुछ नीचा हुआ,
ये दीवारें भी कला द्वारा ही हैं खींची हुईं
ये प्रकृति भी है किसी की कला द्वारा सींचा हुआ।

हालातें तो देखो उनकी 
जो की अपने पुरखों की आत्मा ज़िंदा रखते हैं,
और ज़्यादा हैरतें होती हैं उन लोगों की हैसियत को देख
जो अपनी ज़ुबान पर इस कला की निंदा रखते हैं।

विज्ञान पढ़ते हैं आज
उसका सम्मान करते हैं आज,
आज उठते हैं, आज जाते हैं
नया आविष्कार करते हैं आज।

पर एक बात जानी हमने—
सबसे दुर्लभ है कला,
वह सेब तो शायद किसी और के सिर गिर जाता
पर मोना-लिसा वापस न है बना।

कला बन गई, तो बन गई
उसको छेड़ा नहीं जाता है,
एक लेखक, एक कवि का कलम या चित्रकार का ब्रश
दिशा कोई भी हो, हमेशा सही जाता है।

कला को सीमित मत रखो
जहाँ कुछ नया बना, वो कला है,
शुरुआत में लगता दुनिया से अलग
पर समय के साथ समाज में यह ढला है।

समाज आगे बढ़ चुका
हम यह सोचते हैं कि समाज आज विकसित है,
कलाकार को जबरदस्ती, ज़रूरत से ज़्यादा पढ़ाया जाता है
और कहते हैं— अब वह शिक्षित है।

रूढ़ीवादी समाज के लिए आज विज्ञान वही है।
रूढ़ीवादी समाज के लिए आज भी सम्मान वही है।
कला को महाभारत के रूप में पूजते हैं,
और कलाकार को भगवान का दर्जा देकर कहते हैं—
वह कलाकार नहीं है।

कह दें अगर कि कृष्ण ने बजाई
तो बाँसुरी की ध्वनि मधुर लगती है,
पर उसी को अगर कोई सड़क किनारे बजाए
तो उनको वह ध्वनि बेसुर लगती है।

आज जान लेना चाहिए
कला की निंदा करने वालों को,
कि एक कला ज़िंदा कर देगा
वापस से उनके अच्छे सालों को।

पहचाना कला को ब्रजवासियों ने
पहचाना मोर मुरली-बजैया को,
कलाकार था वो भी, गायब करता माखन
इठलाते हुए, हँसता-रुलाता मैया को।

खैर, अब वापस आए इस समय में।
और हम कलाकार, ये कड़वा सच जान लें,
कि कृष्ण तो काफ़ी आएँगे,
पर न मिलेंगे वैसे ब्रजवासी, जो कला को पहचान ले।

— दिव्य डनसेना



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