जो दर्द है मेरा वही मेरी दवा है
किस बात की मुझको मिली ऐसी सज़ा है
चाहत है यही मैं भुला ही अब उसे दूं
पर वो है कि ऐसे मेरे दिल में बसा है
देखी नहीं उसने मेरी आहों की तपिश
जो देने लगा ज़ख्मों को मेरे हवा है
पर बात तो ऐसी कोई मैंने की नहीं
फिर यार हमारा यूं क्यों हमसे खफ़ा है
वो एक जो चेहरा मेरे दिल में है बसा
बाज़ार में चेहरा वही फिर से दिखा है
चेहरे से हटा दो अभी जुल्फ़ें ये ज़रा
क्यों चाँद सा मुखड़ा ये घटा में छुपा है
क्या क्या न सहे ज़ख्म यहां इश्क़ में हम
क्या जानता है तु, क्या ही तुझको पता है
बच इश्क़ की ज़हरीली तु राहों से ज़रा
इसमें ही यहां यार अभी तेरा भला है
हम तो वफ़ा के दीप जलाये खड़े हैं
पर दोस्त क्यों तूने सदा मुझको ठगा है।
अनमोल
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Author:
Anmol (Pseudonym) (
Offline) - Published: July 19th, 2026 00:01
- Category: Unclassified
- Views: 3

Offline)
Comments1
The question I have in this poem is to whom is this poem talking? Is it a soliloquy, a literal friend or the reader. Well written it calls to attention the relationship. In so doing it speaks to many such. Well done
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