धर्म ॥

Divya Dansena

विचार लो कि हुआ
कल्कि का जन्म गैर धर्म में,
तुम्हारे धर्म और उसके धर्म
दोनों में है फ़र्क कर्म में।

विचार लो कि हुआ
कल्कि का जन्म गैर धर्म के गर्भ से,
क्या तब भी तुम उसको पूजोगे?
क्या तब भी तुम उसे अपना कहोगे गर्व से?

जब पाप बढ़ा है इतना,
जब लालचियों का व्यक्तित्व खड़ा है इतना,
जब आबादी है इतनी,
तुम ढूँढोगे उसको कितना?

ये भी कहेगा कल्कि हूँ,
वो भी कहेगा—“मैं कल्कि हूँ”,
ये भी कहेगा अवतार हूँ,
वो भी कहेगा—“मैं अवतार हूँ”,
कोई कहेगा मैं कृष्ण हूँ,
कोई कहेगा—“मैं गीता का सार हूँ।”

अब इसमें, उसे कैसे पहचानोगे तुम?
क्या सही, क्या गलत , कैसे जानोगे तुम?

पहचान लिया तो मान जाऊँगा
तुम असली भक्त हो,
मान जाऊँगा कि इस नरम, विचलित दुनिया में
एक तुम ही हो जो सख्त हो।

अगर विचारने कहूँ कि भगवान का जन्म
किसी गैर धर्म के देश में हुआ,
तो ये कहने से पहले मुझे रोक दोगे तुम
क्योंकि इससे ज़्यादा सुनने वाला, न आज तक कोई भक्त हुआ।

पर भक्त हो तुम आखिर किसके?
तुम कहोगे—“हूँ मैं भक्त भगवान का।”
अब इससे आगे क्या ही कहूँगा?
कुछ कहूँगा, तो ले लोगे प्रतिशोध अपमान का।

पर नहीं किया अपमान मैंने भगवान का।
मैं उस असत्य की असलियत बता रहा था, जिसे तुमने भगवान मान लिया।
वही असत्य जिसने , कईयों की जान ली,
वही असत्य जिसने , कईयों को मार दिया।

तुम कहोगे:
वे नहीं तो कौन भगवान है?
तुम कहोगे वही ईश्वर है क्योंकि,
उसी में बसती, हम सबकी जान है।
पर मैं इसे नहीं मानता क्योंकि , ईश्वर में नहीं हमारी बसती ,
बसती हममें ईश्वर की जान है।

असल में तुम जिसे पूजते हो
उसे तुमने ही बनाया है,
एक बार खुद से पूछो हुज़ूर
तुमने भगवान को, या भगवान ने तुमको बनाया है ?

न कहना कि तुम जिसे पूजते हो,
और मैं जिसे पूजता हूँ, वो एक है।
मैं धर्म के हिसाब से नहीं कह रहा हूँ,
मैं इसे विवेकानुसार कह रहा हूँ: जिसके पास विवेक नहीं, और जिसके पास विवेक है।

तो अब प्रश्न आता है,
कि भगवान क्या है?
तो अब प्रश्न आता है,
कि वो राम, वो हनुमान क्या है?

असल में नज़रिए की बात है,
हर नज़रिया देता तुमको मात है।
इसी नज़रिए के कारण आज धर्म बँट गए हैं,
इसी नज़रिए के चलते इस समाज में “जात” है।

भगवान वहीं,
जहाँ सारे बिंदु आकर मिल जाएँ।
भगवान वहीं,
जहाँ सारे गुलाब इकट्ठे खिल जाएँ।

भगवान तो सार हैं उन सारे कर्मों का,
जो इस दुनिया में होते हैं।
भगवान अवतरित होते हैं जब,
सारे समाज एक साथ नैतिक मूल्य खोते हैं।

धर्मों को इंसानों ने बनाया,
भगवान तो पहले से ही उपस्थित हैं।
उस भगवान-ख़ुदा-पैग़म्बर को तुम्हारी चर्चा की क्या ज़रूरत है?
वो तो अनंत काल से ही चर्चित हैं।

जब उनका न कोई रूप है,
तो क्यों उनको तुम सजाने लगे?
जब पहले से ही वो इतने खूबसूरत,
तो क्यों उनको तुम सँवारने लगे?
हर कण में मौजूद हैं वो, ये जब समझ गए तुम,
तब समझ लेना कि तुम उनको पहचानने लगे।

जब तक न मन साफ़ तुम्हारा,
तब तक उनकी पहचान कैसे करोगे?
जब मन ही शुद्ध नहीं तुम्हारा,
तो क्या वस्त्र, धर्म, आवाज़ से उनकी पहचान करोगे?

धर्मों, जात-पात , को मात्र
लड़ने खातिर बनाया है।
इसलिए तो बीच मझधार तुमने
खुद को पाया है।

इस माया-जाल से निकलो,
अपने आसपास हर चीज़ को अच्छे से जानो तुम।
फिर कहूँगा मैं कि: क्या तुमने बनाया है, क्या उसने बनाया है—
उसको पहचानो तुम।

Comments +

Comments1

  • sorenbarrett

    A lovely write with which I mostly concur but I do not call god him nor her but all things each with its energy that energy that I give it and the energy it gives me. I am against religion because it is man made and against the gods of man because they are man made as well. I get much of this from your poem also. Very nice

    • Divya Dansena

      Thank you . It’s a matter of happiness for me when I write something from my point of view , but I later see that many people , specially some great creators like you share the same pov .

      • sorenbarrett

        You are most welcome and it is my pleasure. From a standard religious view with which I was brought up it has evolved over the years to type of panphysicism where all things are related and a part of each other.



      To be able to comment and rate this poem, you must be registered. Register here or if you are already registered, login here.