ऐ देश मेरे, ऐ वतन मेरे
ऐ मातृभूमि, ऐ वतन मेरे,
हर बार तेरे आगे झुक जाता हूँ,
कहीं भी जाऊँ, कहीं से आऊँ,
तेरी ही आँचल में सुख पाता हूँ।
जहाँ गाती नदियाँ मधुर संगीत,
जिसपर सागरों का नाम पड़ जाता है,
जो इस दुनिया में कोई न कर सका,
वो मेरा देश कर जाता है।
जहाँ के नदियों के पानी से,
मैं अपनी प्यास बुझा पाता हूँ,
कृतकृतज्ञ हो जाता हूँ,
मैं बार-बार तुझमें खो जाता हूँ।
जहाँ जन्मे हैं कई सितारे,
कई हैं जीते, कई हैं हारे,
पर हारों का हाथ देशवालों ने छोड़ा नहीं,
बन कर खड़े रहे हारे के सहारे।
सोने की चिड़िया सा लगता,
मेरा वतन था प्यारा सा,
बुलाता सबको अपनी शरण में,
चाहे दिखता हो वो जीता सा, या दिखता हो वो हारा सा।
पर जिसे सहारा दिया इसने,
उसी ने पीठ पर खंजर मारा था,
पर फिर भी उतना दुख नहीं हुआ,
क्योंकि उस दिन देश हमारा असल मायनों में नहीं हारा था।
हारे असल में उस दिन हम,
जिस दिन किसी के कुछ बोलने पर हमारी एकता टूट गई,
जिसका जो मकसद था वो पूरा हो गया,
उसी दिन हमारे हाथों से हमारी आज़ादी छूट गई।
अब तोड़कर लूटना था किसी के घर को,
कोई खुद क्यों मेहनत करके सामान उठाए - लाए,
जब घर का मालिक ही चोरी करने में मदद करे,
तो चोर क्यों मेहनत करे, जब घर का भेदी लंका ढाए।
बिखरी पहेलियों को साथ लाकर सब कुछ ठीक करना,
बेहद मुश्किल सा लगता है,
जिसके विभाजित हिस्से में भी विभाजन हो,
उसे कैसे कोई जोड़ सकता है?
जब इंसान ही इंसान से नफ़रत करे,
तो स्वतंत्रता के दरवाज़े और भी बंद हो जाते हैं,
अनाज को खुद उगाने वाले,
लगान के बाद खुद कुछ नहीं खा पाते हैं।
सोने की चिड़िया को ध्वस्त कर,
उसके अंगों का सौदा कर दिया,
लूटने वालों को ही हमने,
वफ़ादारी का वादा कर दिया।
वचन दिया तो निभाओगे ही,
आख़िर देश ही ऐसा, जहाँ प्राण जाएँ पर वचन न जाए,
पर उस वचन का क्या होगा,
जिसे मातृभूमि को हम बचपन से देते आए?
बहुत समय तक ग़ैरों के आगे झुके रहे,
फिर आँखें खुली थोड़ी हमारी,
नेहरू, गांधी, बोस, भगत, चंद्रशेखर, पटेल, अंबेडकर,
ऐसे हाथ जोड़े हमने, देखती रह गई दुनिया सारी।
साथ मिलकर लड़े,
माना विचारों में थोड़े भेद थे,
पर मिलकर सबने भर दिए,
देश के अंदर जितने भी छेद थे।
संघर्ष किया, बलिदान दिया,
ग़ैरों से नाता तोड़ दिया,
तब जाकर स्वतंत्रता मिली हमें,
जब ग़ैरों ने देश को छोड़ दिया।
जब डर होता है कि कोई हमसे आगे दौड़ जाएगा,
तब उसके पैर काट देते हैं,
शांति से देश छोड़ सकते थे वो,
पर तब वो देश को बाँट देते हैं।
आधी रात को वे कहने आए,
कि कल हमारा देश दुनिया पे जमाए डेरा होगा,
उनका समय चला गया, अब हमारा समय आया है,
कल एक सवेरा होगा।
उन्होंने कहा कि कल के दिन,
किसी ने किसी को न बाँटा होगा,
कल अपनी दाल पर अपना हक होगा,
कल रोटी अपनी, अपना आटा होगा।
बंधन मुक्त कर दिया हमको,
छुड़ा लिया जो गुलामी से,
कुछ ज़्यादा उनके लिए तो हम नहीं कर सके,
इसलिए शुक्रिया कहते सलामी से।
उनके ख़्वाबों का एक राष्ट्र था, जिसे पूरा कर,
एक ऋण चुकाना था हमको,
उन्होंने जो किया वो हम भी कर सकते हैं,
उनको था ये बताना हमको।
पर हार गए हम तो हुज़ूर,
सिर्फ़ उनकी मेहनत की गाथाएँ गाते रह गए,
देश के अंदर हो रहे ज़ुल्मों के आक्रोश को,
अपने अंदर दबाते रह गए।
ख़ैर छोड़ो ये सब बातों को,
अपने देश की महानता बताते हैं,
कोई कितनी करे बुराइयाँ देश की,
देश के आगे शीश झुकाते हैं।
उत्तर से दक्षिण तक है,
विविधता का सार यहाँ,
पूरब से पश्चिम तक है,
जीने-मरने की मार यहाँ।
ऐ देश मेरे, ऐ भारत मेरे,
तुझ में ही सारी खुशियाँ पाता हूँ,
कृतकृतज्ञ हो जाता हूँ,
आख़िर तेरे ही आगे झुक जाता हूँ।
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Author:
Divya Dansena (
Offline) - Published: August 15th, 2026 12:55
- Category: Sociopolitical
- Views: 3
- In collections: दिल से निकले , मुस्कुराते लफ़्ज़ ।।.

Offline)
Comments1
A poem of praise to a great country mother of many inventions and most intelligent and wise people land of suffering and land of the future. Well written
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