मिलहि राम लखन संग ताता।
भाव विनय हि मिलहिं भ्राता।।
मिलहि एक-दूजे जब लोगा।
चलहि बारात शुभ संयोगा।
सजते राम-लखन द्वौ भाई।
भरत शत्रुघ्न देखि हर्षाई।।
बैठे गजहि अयोध्या राजा।
चलहिं पीछे सकल समाजा॥
शोभित अरु हैं कुलगुरु ज्ञानी।
वशिष्ठ मुनि सम ध्यानी-मानी॥
दृश्य मनोहर देखहि लोगा।
निहाल ऐसे को नहि होगा॥
राम-लखन बाराती संगा।
लगे जनक-दशरथ के अंगा। ।
राम-लखन मण्डप जब आए।
देखि जनक कुटुम्ब हर्षाए।।
मण्डप पण्डित वधू बुलाए।
मातु-सखी सिय आदर लाए।।
बैठी सीता उर्मिला हौले।
राम-लखन मुनि वचन सुबोले।।
भावुक पल यह ऐसा होता।
दान सुता करते पितु रोता।।
गहहिं रघुवर सिय सुकुमारी।
जनक राज की हृदय दुलारी।।
लखन उर्मिला भरत मांडवी।
श्रुतकीरति रिपुदमन सुहावई।।
गहि कर पावक करि प्रदकछिना
सात वचन करि फिर विवेचना।।
कछु वचनन्हि वर बाढ़ि आगे।
कछु महँ बढ़ि वधू भाग जागे
सात वचन कर मूल यहि होइ।
सुख-दुख मिलि बाँटी सब सोइ॥
सात वचन जब पूरन कर्मा।
देई असीस पितु गुरु धर्मा॥
लहि असीस सब वृद्ध सयाने।
नावि माथा विप्र विद्वाने॥
काव्य भावार्थ :-
जब श्रीराम और लक्ष्मण विवाह मंडप में पहुँचे, तो उन्हें देखकर महाराज जनक और उनका सम्पूर्ण परिवार अत्यंत हर्षित हुआ। मंडप में उपस्थित विद्वान पंडितों के आह्वान पर माताएँ और सखियाँ आदरपूर्वक सीता जी को लेकर आईं। सीता जी और उर्मिला जी अत्यंत नम्रता से मंडप में विराजमान हुईं, और मुनि वशिष्ठ के वचनों का श्रीराम व लक्ष्मण ने आदरपूर्वक पालन किया।
यह पल अत्यंत भावुक कर देने वाला होता है, जब पिता अश्रुपूरित नेत्रों से अपनी कन्या का दान करता है। इसके पश्चात् रघुवीर श्रीराम ने जनकराज की हृदय-दुलारी सुकुमारी सीता जी का हाथ थामा (पाणिग्रहण किया)। इसी प्रकार लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-माण्डवी और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति का भी पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ।
सभी जोड़ों ने पवित्र अग्निदेव का हाथ जोड़कर ध्यान किया, उनकी परिक्रमा (फेरे) ली और विवाह के सात वचनों की विवेचना की। कुछ वचनों में वर आगे रहता है और कुछ में वधू आगे बढ़कर धर्म का पालन करती है। इन सात वचनों का मूल सार यही है कि जीवन के हर सुख और दुख को दोनों मिलकर आपस में बाँटेंगे।
जब सात वचनों का यह पवित्र अनुधान पूर्ण हुआ, तब पिता, गुरुजनों और धर्माचार्यों ने नवदंपतियों को अपना पावन आशीर्वाद प्रदान किया। अंत में सभी ने मस्तक झुकाकर वृद्धजनों, गुरुओं और विद्वान ब्राह्मणों का आशीर्वाद ग्रहण किया।
मूल रचना मेरे ब्लॉग पर पढ़ें: https://kavitaonkiyatra68.blogspot.com/2026/08/shree-ramayanamritam-bhag-10-chhand-stuti.html"
-
Author:
भारत भूषण पाठक\'देवांश\' (Pseudonym) (
Online) - Published: August 16th, 2026 08:06
- Comment from author about the poem: It is an effort to connect youth towards the lesson of Ramayana.
- Category: Unclassified
- Views: 0

Online)
To be able to comment and rate this poem, you must be registered. Register here or if you are already registered, login here.