फ़र्क फ़िराक़ का

uglykavi

गालियाँ किस्मत में हों तो -
क्या फ़र्क है
कहने को
जेन ज़ी जुन्जी में?
शौहरत शहादत शराबियत में
क्या फ़र्क है?
मतलब के लिए
गधे को बाप
कहनेवालों के लिए
क्या फंर्क है?
फ़र्क के फ़ासले
मिटा दिए
जाने किसकी फ़िराक़ में?
फ़िराक़ का तो
पता न चला।
सड़ी गली गलियाँ
निकाल लीं।
ना मालूम किस
मुकाम के लिए?
उस राह चलनेवाले की -
ज़माने ने
ठरक देखी,
ठुमक देखी,
ठनक देखी।
कहें कवि लटपट गोरखी
किसकी फिराक में
फिर गया
तेरा आज कल और परसों?
बीत गए बरसों।
करी न कोई भलाई
ऐसी फितरत किसके
क्या काम आई?

  • Author: uglykavi (Offline Offline)
  • Published: September 14th, 2026 02:28
  • Comment from author about the poem: लिख दिया कुछ मैंने यूं ही जाने किस बदहवासी में। कह दिया ये लो - फ़िराक़ साहब की याद में, एक गुजरे जमाने की तन्हाई में। It seems an empty material world! Sadly but truly. :-( Dedicated to Firaq Gorakhpuri!
  • Category: Reflection
  • Views: 1
  • In collections: Hindi.


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