मेरे कमरे में एक खिड़की खुली ही रहती है (नज़्म)

Anmol Sinha

मेरे कमरे में एक खिड़की खुली ही रहती है

सर्द मौसम में वो शबनम से धुली रहती है

 

कहने को तो वो एक खिड़की है

और कुछ भी नहीं

हवा के साथ थोड़ी रोशनी है

और कुछ भी नहीं

 

मगर कैसे कैसे रंगों को वो दिखाती है

मुझे वो चांद और तारों से भी मिलाती है

कभी जब रात को यूं ही उठ कर बैठता हूं

पास के पेड़ों का संगीत वो सुनाती है

 

मेरी तन्हाई को झोंको के साज़ देती है

मेरी ग़ज़लों के हर लफ्ज़ को आवाज़ देती है

 

उसके होने से मुझे आसमान दिखता है

मुझे कमरे से ये सारा जहान दिखता है

 

न जाने कितने नए सूरज वहां निकलते हैं

और फिर शाम होते ही वहीं पर ढलते हैं

फिर रात होते ही तारों की फौज आती है

साथ अपने कितने ही मौज लाती है

 

मैं चुपचाप वहीं से आसमान पे नज़र फेरता हूं

लाल,नीला,और फिर मध्यम होते देखता हूं

 

हवाएं आती हैं उस खिड़की से गुनगुनाती हैं

मुझे वो लोरियां गा-गाकर फिर सुलाती हैं

 

कोई भी वक्त हो ये मायूस नहीं होने देती

ये खिड़की मुझे कभी तन्हा नहीं होने देती l

 

अनमोल

  • Author: Anmol (Pseudonym) (Offline Offline)
  • Published: October 9th, 2025 06:30
  • Category: Love
  • Views: 7
Comments +

Comments2

  • Ajay Sinha

    बेहतरीन, उम्दा लाजवाब

  • Priya Tomar

    Bahut sundar !



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