॥ सवैया ॥
राज रहे पहले तहँ जंगल, पूजन संकट स्वप्राण हरामन।
भूपन धौनी राज्य विलोकि, बनाय दिहो सुरम्य यही धामन।।
भक्तन माहिन बीच विराजत, हार रयो भव-बाधन भीड़न।
दिव्य अलौकिक पावन तीरथ, नाश करै सब पीड़न-कीड़न।।
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॥ चौपाई ॥
सुनहि व्यथा फिर मुनिवर बोले।मंदहि मंदहि मुस्के हौले।।
जनक राज सुनहू अब राजा। दूत पठायहू सब साजहिं साजा।।
दूत कहउ सब ही समाचारा। दशरथ बोले बारंबारा।।
कुशल कहहु सब मम सुकुमारा। चंचल लखन राम-दुलारा।।
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Author:
भारत भूषण पाठक\'देवांश\' (Pseudonym) (
Online) - Published: January 24th, 2026 12:54
- Comment from author about the poem: यह रचना मेरे हृदय के समीप है। इसमें बाबा शुम्भेश्वरनाथ की महिमा और प्रभु श्री राम के मंगल विवाह का आनंद समाहित है। इसमें किरीट सवैया (24 वर्ण) और चौपाई (16 मात्रा) के शास्त्रीय अनुशासन का पालन किया गया है। ....................................................................... English Essence: This work celebrates the divine aura of Baba Shumbheshwar and the joyous occasion of Lord Rama's wedding procession, following traditional Indian poetic meters For detailed information visit here:- https://kavitaonkiyatra68.blogspot.com/2026/01/mithila-ram-baraat-darshan-kirit-sewaiiya-youth-day_01222084529.html
- Category: Spiritual
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Comments1
"इस नौवीं कड़ी में मैंने बाबा शुम्भेश्वरनाथ के मंदिर के गौरवमयी इतिहास और प्रभु श्री राम की पावन बारात के प्रसंग को एक साथ पिरोया है। शास्त्रीय छंदों (किरीट सवैया और चौपाई) का यह संगम आपको कैसा लगा? आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए आशीर्वाद समान होगी। मेरे लेखन की यात्रा के बारे में अधिक जानने के लिए आप मेरी प्रोफाइल (Bio) देख सकते हैं।"
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