ज़िद्दी
मुझको कितनी ठोकर मारी हर बारसंभल ही जाता हूँ
मुझको कितना तोड़ा अबतक फिर भी मैं जुड़ता जाता हूँ
वो कौन ख़ता है हे ईश्वर इक बार मुझे बतलाओ ना
अबके मुझको ऐसा तोड़ो टूटूँ तो फिर जुड़ पाऊँ ना
पत्थर तुम हो पत्थर हम हैं इतना मैं और समझता हूँ
तुम आसमान के तारे हो मैं राह मैं ठोकर खाता हूँ
चूर हुआ थक कर मालिक कहीं ख़ुद ही मैं गिर जाऊँ ना
अबके ऐसे ठोकर मारो गिर जाऊँ तो उठ पाऊँ ना
कितनी बार जला, मुझको तू जला मुझे मैं सहता हूँ
नही भरते मेरे घाव प्रभुअनजला राख का कोयला हूँ
मन घायल है तन पागल है थोड़ा और जलाओ ना
अबके ऐसे मुझे आग लगा राख भी मैं बन पाऊँ ना
पत्थर दिल हूँ मैं मालिक फिर दर्द ये कैसा उठता है?
आंसू तो सारे सूख गए आँखें क्यूँ नम हो आयी हैं?
इस बार हमारी बात रखो विश्वास कहीं टूट जाए ना
इस बार रुलाना ऐसा की अगली बार रो पाऊँ ना
क्या हक़ है राह के पत्थर को कोई भी चाह बढ़ाने का?
क्या हक़ है सूनी आँखों को दो सपनों में खो जाने का?
क्या हक़ है मुझको हे ईश्वर एक बार मुझे समझाओ ना
अबके ऐसे मुझे पास बुला आजाऊँ तो फिर जाऊँ ना
-विमल

Offline)
Comments2
There is self flagellation and immolation in this poem that has become a plea to a god. Well written
Thank you.
You are most welcome
वाह....कितनी करुण प्रार्थना है,कि प्रभु के सामने दिल चीर के रख दिया...। पढकर वो ईश्वर भी रोया तो जरूर होगा..🌹
🙏
महफ़िल में ज़ख्म दिखाते हैं हम तो,
किन्तु लोग वाह-वाह किए जाते हैं।
-विमल
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