फिर तेरी याद के शम्मों को जलाया हमने

Anmol Sinha

फिर तेरी याद के शम्मों को जलाया हमने

इस तरह दिल के अंधेरों को मिटाया हमने

 

चाहे जो पूछ लो पर ये कभी भी मत पूछो

किस तरह से यहां तुमको है भुलाया हमने

 

जाने फिर किसने बताया है ये तूफानों को

आज फिर रेत से घर अपना बनाया हमने

 

क्यों मेरी हार पे तुम साथ हमारा छोड़े

तेरी हर हार पे है साथ निभाया हमने

 

तेरे ऐबों को सदा हमने छुपाया हमदम

तेरी हर भूल को सीने से लगाया हमने

 

अपने वादों को निभाया है यहां शिद्दत से

जो कहा तुझसे वो सब करके दिखाया हमने

 

हां बहाया है पसीने को भी पानी जैसा

तब कहीं यार ये घर अपना बनाया हमने

 

उम्र भर दर्द सहा जान तेरी उल्फ़त में

तब कहीं जाके है अश्कों को बहाया हमने

 

यार होकर भी जुदा है तो तु मेरा अपना

कब बता तुझको यूं समझा है पराया हमने

 

कहता रहता है हमें तु क्यों सितमगर अक्सर

यार हमको बता कब तुझको सताया हमने

 

हो न जाओ यूं ही बदनाम ज़माने में तुम

इस लिए नाम तेरा सबसे छुपाया हमने

 

और 'अनमोल' कमाया नहीं दुनिया में कुछ

नाम थोड़ा है यहां अपना कमाया हमने।

 

अनमोल

  • Author: Anmol (Pseudonym) (Offline Offline)
  • Published: April 28th, 2026 20:30
  • Category: Unclassified
  • Views: 1
Get a free collection of Classic Poetry ↓

Receive the ebook in seconds 50 poems from 50 different authors


Comments +

Comments1

  • sorenbarrett

    This conversive poem seems intimate and even romantic. Lovely



To be able to comment and rate this poem, you must be registered. Register here or if you are already registered, login here.