तुम्हारी याद के बादल ज़हन में छा गए फिर से
लो अब मौसम उदासी के मेरे घर आ गए फिर से
बहुत मुश्किल से निकला था मैं अपने इस ग़म-ए-दिल से
और एक तुम हो तराने इश्क के क्यों गा गए फिर से
यहां मैं तो तुम्हारी खैरियत की चाह रखता हूं
और एक तुम हो नया एक ज़ुल्म मुझपे ढ़ा गए फिर से
कि कब हम तुमसे बरहम थे ऐ हमदम ऐ मेरी जाना
क्यों फिर तुम आज झूठी कसमें मेरी खा गए फिर से
कि अपना नाम तेरे लब से सुनकर यूं लगा हमको
हम अपने खोए सारे चैन को अब पा गए फिर से।
अनमोल
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Author:
Anmol (Pseudonym) (
Offline) - Published: July 24th, 2026 22:53
- Category: Unclassified
- Views: 4

Offline)
Comments1
The mere presence of a person serves as a memory that brings sadness and pain. Well written
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