कब कहा तुझसे कि मेरी तु पज़ीराई कर
हां मगर दोस्त मेरी यूं तो न रुसवाई कर
(पज़ीराई: आदर/स्वागत)
कर्ज़ तन्हा वो जो रातों का अभी है तुझपर
बैठ जा साथ मेरे उसकी तो भरपाई कर
चाहे तो छोड़ के मुझको चला जा अब हमदम
पर यूं मुझपे न सितम ऐ मेरे हरजाई कर
एक बस तू ही मसीहा है यहां अब मेरा
मेरी मरती हुई धड़कन पे मसीहाई कर
(मसीहाई: मृतक को जीवित करने की शक्ति)
दस्तरस से ये वफ़ा तेरी न बाहर हो अब
इस वफ़ा में तो न अब तू यूं महंगाई कर।
(दस्तरस: पहुंच/नियंत्रण)
अनमोल
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Author:
Anmol (Pseudonym) (
Offline) - Published: August 30th, 2026 02:08
- Category: Unclassified
- Views: 8

Offline)
Comments1
I love the division of the story with the association with principles. This pairing gives the poem deeper meaning that seems quite cultural. Lovely
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